પ્રેમ

: कहते हैं कि जोड़ियां आसमान से बनकर आते हैं पर अगर यह बात सच है तो फिर हीर रांझा की सोनी महिवाल की ओर सस्सी पुन्नू की तकदीर विधाता ने किस कलम से लिखी जो एक दिल एक जान होते हुए भी समाज में एक ना हो सके कि यही तकदीर जस्सी की थी जो तन मन से वरिंदर के साथ एक होते हुए भी समाज के जातिवाद ऊंच-नीच गरीबी अमीरी का शिकार हुई वह दोनों एक दूसरे को जान से भी ज्यादा प्यार करते थे पर उनके घर वालों कोजी प्यार मंजूर नहीं था उनकी नजर में यह एक  महज आकर्षण था जो समय के साथ ही खत्म हो जाता है पर उनको यह पता नहीं था कि उनका  प्यार इस दुनिया से बहुत ऊपर जा चुका है और आसमान को छूने की हिम्मत रखता है
 जस्सी और वरिंदर एक ही मोहल्ले में रहते थे पड़ोसी होने के नाते उनका सुख दुख खाना पीना सब   सांझा  था जिससे के पिता आर्मी में थे एक साथ खेलते पढ़ते तो दोनों जवान हूं और कब प्यार का अंकुर उनके मन में फूटावह खुद भी समझ नहीं पाए समय अपनी चाल से चलता रहा जस्सी के पिता रिटायर होकर गांव में या वापस आ गए और गांव में ही जमीन खरीदकर उन्होंने एक डेयरी फार्म खोल लिया धीरे-धीरे उनके व्यापार में बहुत तरक्की की घर में नौकर चाकर पैसा रुतबा किसी भी चीज की कमी ना रही जस्सी के पिता दिन रात सफलता की सीढ़ियां चढ़ते रहे और उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा

पर कहते हैं कि जो परवान चढ़ जाए वह सच्चा इश्क ही क्या अगर सस्सी पुन्नू के प्यार में तपते मरुथल ना आते सोनी महिवाल मिलने की खातिर कच्चे घड़े पर ना तैरते   वह कभी भी अपने इश्क की गहराई को ना समझ पाते कहते हैं जब तक सोना आग में तप पाया नहीं जाता वह कुंदन नहीं बनता अगर सच्चा प्यार है किसी इंतिहान से नहीं गुजरता वह निखरता नहीं जब फाइनल एग्जाम देकर दोनों गांव आए तब वही गांव उन्हें एक अनजाना सा लगा जिस गली में से भी गुजरते लोग जस्सी से उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछते उसकी खैरियत पूछते लेकिन वरिंदर की तरफ कोई नहीं देख रहा था  अपने लोगों के बीच ही वह खुद को गैर जरूरी और अनजान सा समझ रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था कि लोग उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं विचारों में घूम बुखार आता है 2 सालों में बहुत कुछ बदल गया था जस्सी की शानदार हवेली की बगल में खड़ा उसका टूटा फूटा मकान उसकी हैसियत बयान कर रहा था
पर वरिंदर को आगे बढ़ाने की चाह में उसके गरीब पिता ने अपनी थोड़ी सी जमीन भी साहूकार के पास गिरवी रख दी और वो खुद दूसरों के खेतों में मजदूरी करने लगे लेकिन अमीरी गरीबी के इस अंतर ने हम दोनों परिवारों के बीच की दोस्ती खत्म कर दी लेकिन अगर इस बात से किसी को फर्क नहीं पड़ा तो वो थेवरिंदर और जस्सी  जो दोनों इस अमीरी गरीबी से ऊपर सारी मजबूरियों से दूर शहर की कॉलेज में ना सिर्फ अपना भविष्य बना रहे थे   बल्कि एक दूसरे को बेइंतहा चाहते थे वह ना सिर्फ एक दूसरे को प्यार करते थे बल्कि पढ़ाई में भी बहुत अच्छे थे और सिर्फ पढ़ा ही नहीं स्पोर्ट्स एप कल्चरल एक्टिविटीज हर क्षेत्र में उनका बोलबाला था उन्होंने बहुत सारे नाटक एक साथ स्टेज पर खेलने अगर वरिंदर महिवाल बनता  तो जस्सी सोहनी रांझा की हीर और पुन्नू की ससी यह सब ट्रैक्टर जैसे उनके प्यार को जीवंत कर रहे थे उनका प्यार जीवन के उस स्टेज पर पहुंच चुका था जिसे इश्क कहा जाता है जिसमें एक दूसरे को देखना एक दूसरे को छू ना कोई मायने नहीं रखता जब भी उस महबूब का दीदार करने को जी चाहता वह आंखें बंद कर लेते

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